विश्व पृथ्वी दिवस के अवसर पर झारखंड में पर्यावरण की स्थिति को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। राज्य में तेजी से बिगड़ते पर्यावरण संतुलन और बदलते मौसम के पैटर्न ने प्राकृतिक आपदाओं के खतरे को काफी बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भयावह हो सकती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य गठन के बाद से अब तक कई क्षेत्रों में सूखे की स्थिति देखने को मिली है। इसके साथ ही कई इलाकों में असामान्य बारिश भी दर्ज की गई है, जिससे कभी बाढ़ तो कभी जल संकट जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। जलवायु परिवर्तन का सीधा असर झारखंड के पर्यावरण और जनजीवन पर देखने को मिल रहा है।

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि जंगलों की लगातार कटाई, खनन गतिविधियों का विस्तार और अनियोजित विकास इस समस्या की मुख्य वजह हैं। इन कारणों से न केवल पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है, बल्कि स्थानीय जलवायु और जैव विविधता पर भी नकारात्मक असर पड़ रहा है।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि वर्ष 2025 में प्राकृतिक आपदाओं के कारण करीब 478 लोगों की जान गई। कई जिलों में सामान्य से अधिक वर्षा दर्ज की गई, जबकि कुछ इलाकों में सूखे जैसी स्थिति बनी रही। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि मौसम का चक्र तेजी से अस्थिर हो रहा है।
तापमान के स्तर में भी लगातार बदलाव देखा जा रहा है। कई दिनों तक सामान्य से अधिक गर्मी पड़ रही है, वहीं कुछ दिनों में अत्यधिक बारिश हो रही है। इस तरह के असंतुलित मौसम का सीधा असर कृषि, जल स्रोतों और आम लोगों के जीवन पर पड़ रहा है।
झारखंड में जल संकट की समस्या भी धीरे-धीरे गंभीर होती जा रही है। कई क्षेत्रों में भूजल स्तर गिरता जा रहा है, जिससे पेयजल की समस्या बढ़ रही है। इसके अलावा जंगलों के घटते क्षेत्रफल ने वन्यजीवों और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी खतरा पैदा कर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति से निपटने के लिए वनों का संरक्षण, जल स्रोतों का पुनर्जीवन और सतत विकास नीतियों को अपनाना बेहद जरूरी है। साथ ही लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने की भी आवश्यकता है।
कुल मिलाकर, झारखंड में बिगड़ता पर्यावरण एक गंभीर चेतावनी है, जिसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ सकती हैं।