देवघर में आयोजित गंगा अष्टदश महापुराण यज्ञ के पांचवें दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। गंगातट स्थित पावन परिसर में चल रहे इस भव्य धार्मिक आयोजन में दूर-दूर से आए भक्तों ने भाग लेकर पूजा-अर्चना और हवन में आहुति दी। पूरे वातावरण में मंत्रोच्चार, भजन-कीर्तन और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत संगम देखने को मिला।

इस अवसर पर कथावाचक डॉ. दुर्गेश आचार्य ने अपने प्रवचन में कहा कि गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि दिव्य चेतना का प्रवाह है। उन्होंने बताया कि गंगा मानव जीवन को पवित्र करने वाली आध्यात्मिक शक्ति है, जो केवल जलधारा नहीं बल्कि संस्कृति, आस्था और सनातन परंपरा की जीवंत प्रतीक है। उनके उद्बोधन ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।

यज्ञ मंडप में विधिवत हवन-पूजन के साथ विशेष अनुष्ठान संपन्न किए गए। आचार्यों और पंडितों के सान्निध्य में वैदिक मंत्रों के उच्चारण के बीच भक्तों ने आहुति अर्पित की। आयोजन स्थल को आकर्षक सजावट और पुष्पमालाओं से सजाया गया था, जिससे वातावरण और भी भव्य एवं दिव्य प्रतीत हो रहा था।

कार्यक्रम में हरिद्वार, प्रयागराज और वाराणसी जैसे तीर्थ स्थलों के महत्व पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया। श्रद्धालुओं को गंगा संरक्षण और स्वच्छता के प्रति जागरूक रहने का संदेश दिया गया। साथ ही यह भी कहा गया कि गंगा केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों की आधारशिला है।

आयोजन समिति के सदस्यों ने बताया कि यज्ञ के समापन तक विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। भक्तों के लिए प्रसाद और भोजन की भी समुचित व्यवस्था की गई है। पूरे आयोजन को सफल बनाने में स्थानीय स्वयंसेवकों और समिति के पदाधिकारियों की अहम भूमिका रही।

गंगा अष्टदश महापुराण यज्ञ का यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि समाज में आध्यात्मिक जागरूकता और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने का भी संदेश दे रहा है।
