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आखिर कौन है ‘भद्रा’? जिसके साये में शुभ कार्य करना माना जाता है वर्जित

Religious February 28, 2026 By Mrityunejay Malviya
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हिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्य से पहले मुहूर्त देखने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण या फिर होलिका दहन जैसे पर्व— हर मांगलिक कार्य से पहले पंचांग में भद्रा का विचार अवश्य किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, भद्रा काल को विघ्नकारी माना गया है और इस समय शुभ कार्य करने से अपेक्षित फल नहीं मिलता।

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विशेष रूप से होलिका दहन के समय भद्रा का होना अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। विद्वानों का मत है कि यदि होलिका दहन ‘भद्रा मुख’ में किया जाए तो उसका दुष्प्रभाव समाज और व्यक्ति दोनों पर पड़ सकता है।

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कौन है भद्रा? क्या कहती है पौराणिक कथा

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पौराणिक मान्यता के अनुसार, भद्रा सूर्य देव की पुत्री और न्याय के देवता शनि देव की सगी बहन मानी जाती हैं। जब उनका जन्म हुआ, तो उनका स्वभाव अत्यंत उग्र और विनाशकारी बताया गया। कथाओं के अनुसार, वे यज्ञ-अनुष्ठानों में विघ्न डालती थीं और उनके प्रभाव से देवता एवं ऋषि-मुनि भी भयभीत रहने लगे।

तब ब्रह्मा जी ने उन्हें समझाकर पंचांग के एक विशेष काल— ‘विष्टि करण’— में स्थान दिया। साथ ही यह भी कहा गया कि जो व्यक्ति भद्रा के समय में कोई शुभ कार्य करेगा, उसे पूर्ण सफलता नहीं मिलेगी। तभी से भद्रा काल में शुभ कार्यों का त्याग करने की परंपरा शुरू हुई।

होलिका दहन और भद्रा का संबंध

शास्त्रों में उल्लेख मिलता है—

‘भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा’

अर्थात भद्रा काल में दो कार्य नहीं करने चाहिए— रक्षाबंधन (श्रावणी) और होलिका दहन (फाल्गुनी)।

मान्यता है कि यदि भद्रा में होलिका दहन किया जाए तो उस स्थान पर नकारात्मक ऊर्जा बढ़ सकती है और जन-धन हानि की आशंका रहती है। इसलिए इस वर्ष भी 3 मार्च 2026 को विद्वानों ने भद्रा समाप्ति के बाद ही होलिका दहन करने की सलाह दी है।

ज्योतिषीय दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण है भद्रा काल

ज्योतिष शास्त्र में भद्रा को चंद्रमा के करणों में से एक ‘विष्टि करण’ माना गया है। इस समय ग्रहों की स्थिति ऐसी मानी जाती है जो मानसिक अस्थिरता, क्रोध और भ्रम को बढ़ा सकती है। इसलिए इस दौरान मांगलिक कार्यों में सफलता की संभावना कम मानी जाती है।

इस वर्ष 3 मार्च को भद्रा के साथ-साथ चंद्र ग्रहण का भी प्रभाव बताया जा रहा है, जिससे यह समय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। ग्रहण के सूतक और भद्रा दोष से बचने के लिए शुभ मुहूर्त में पूजा करना ही श्रेष्ठ माना गया है।

क्या रखें सावधानियां?

✔ भद्रा समाप्त होने के बाद ही होलिका दहन करें

✔ पंचांग देखकर शुभ मुहूर्त का चयन करें

✔ पूजन के समय शांत और एकाग्र मन रखें

✔ मंत्रोच्चारण और अग्नि देव की प्रार्थना श्रद्धा से करें

शास्त्रों के अनुसार, सही समय पर किया गया पूजन जीवन के नकारात्मक तत्वों को भस्म कर सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। इसलिए भद्रा काल को हल्के में न लें और परंपराओं के अनुसार ही धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करें।

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