महाशिवरात्रि पर लाडले मशक दरगाह में शिव पूजा को हरी झंडी, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से किया इनकार

National February 12, 2026 By Mrityunejay Malviya
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महाशिवरात्रि से पहले एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के अलंद स्थित लाडले मशक दरगाह परिसर में शिव पूजा पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि जब मामला कर्नाटक हाई कोर्ट में लंबित है, तब सीधे संविधान के आर्टिकल 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना उचित नहीं है।

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क्या है मामला?

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अलंद में स्थित लाडले मशक दरगाह ऐतिहासिक रूप से 14वीं सदी के एक सूफी संत और 15वीं सदी के हिंदू संत राघव चैतन्य से जुड़ा स्थल है। यह स्थान लंबे समय से हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लिए आस्था का केंद्र रहा है। हालांकि, वर्ष 2022 में धार्मिक अधिकारों को लेकर विवाद बढ़ने के बाद यहां तनाव और सांप्रदायिक अशांति की स्थिति पैदा हो गई थी।

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फरवरी 2025 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने 15 हिंदू श्रद्धालुओं को राघव चैतन्य शिवलिंग पर महाशिवरात्रि के अवसर पर पारंपरिक पूजा-अर्चना की अनुमति दी थी। इसी आदेश को चुनौती देते हुए खलील अंसारी नामक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी।

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

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जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब विवादित संपत्ति से जुड़ा मामला पहले से हाई कोर्ट में विचाराधीन है, तो याचिकाकर्ता सीधे आर्टिकल 32 का सहारा नहीं ले सकता। अदालत ने इस आधार पर याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

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याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील विभा दत्ता मखीजा ने दलील दी कि यह संपत्ति विधिवत अधिसूचित वक्फ संपत्ति है और मामले में ‘प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट’ से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल हैं। उन्होंने आग्रह किया कि इस याचिका को समान मामलों के साथ टैग किया जाए। हालांकि, पीठ ने इसे स्वीकार नहीं किया और याचिका को वापस लिया हुआ मानते हुए खारिज कर दिया।

अब आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संपत्ति के वक्फ होने या न होने का अंतिम निर्णय संबंधित वक्फ ट्रिब्यूनल द्वारा किया जाएगा। ऐसे में विवाद का अंतिम समाधान अभी शेष है।

महाशिवरात्रि के मौके पर अदालत के इस रुख को हिंदू पक्ष के लिए राहत के रूप में देखा जा रहा है, जबकि कानूनी बहस अभी जारी रहेगी। अलंद का यह ऐतिहासिक स्थल एक बार फिर आस्था, कानून और सांप्रदायिक सौहार्द के बीच संतुलन की परीक्षा बन गया है।

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